इस
आर्टिकल को लिखने से पहले मैं ऐसे विषय पर कई आर्टिकल्स लिख चुका हूं. मगर
इस बार मैं लिखने से डर रहा हूं, संकोच कर रहा हूं, क्योंकि मुझे लगता है
कि इस बार कुछ अलग लिखना चाहिए. किसी ने सच ही कहा है कि "विश्व का कोई भी
सैनिक युद्ध नहीं चाहता है." चूंकि हम भारतवर्ष हैं, हमारा अपना इतिहास,
अपनी पहचान और हमारी संस्कृति है. 10 हजार वर्षों में हमने कभी किसी पर
प्रहार नहीं किया. हम युद्ध नहीं, बुद्ध के देश हैं. मगर पड़ोसी देशों की
करतूतों के कारण हमने कई युद्धों का दंश झेला है. इन युद्धों में जब देश का
सिपाही सीमा पर शहीद होता है, तो हम उनकी शहादत को सलाम करते हैं. देश के
तमाम मीडिया संस्थान उनकी बहादुरी की गाथाएं लिख कर उन्हें श्रद्धांजली
देते हैं. सरकार और प्रशासन मुआवज़ा देकर अपना काम निपटा देते हैं. मगर, इन
सब तामझाम के बावजूद ये कोई नहीं पूछता कि शहीद हुए जवानों के परिवार का
रखवाला कौन होगा? बचपन में पिताजी सिखाया करते थे ' जो भी प्रतिशोध लेना है, तुरंत लो, बाद में केवल समझौता होता है.'
हां एक बात ध्यान रहे इन वाक्यों से कि मैं युद्ध की कल्पना नहीं कर रहा
हूं क्योंकि ना मैं उन्मादी नहीं हूं और ना ही उत्तेजित. मेरा मानना है कि
शांति से सभी समस्याओं का हल किया जा सकता है. ख़ैर, मैं बात कर रहा हूं उन
परिवारों का, जिनकी अमानत देश की सेवा में खप गई. देश के लिए वह चौकीदार
किसी के घर की रीढ़ और दाना-पानी होता है. यह बात कोई भी भारतीय समझ जाएगा.
मैं शुक्रगुज़ार हूं देश की सीमा पर रखवाली
करते हुए जवानों का, मेट्रो में सुरक्षाकर्मियों का, सड़कों के बीच
गाड़ियों को जाम से बचाती ट्रैफिक पुलिस का और महाकुंभ में हमारी सेवा के
लिए अपने परिवारों से दूर रहने वाले पुलिस कर्मचारियों का. उससे कहीं
ज़्यादा शुक्रगुज़ार हूं उनके परिवारों का, जिन्होंने अपनी संतानों को देश
की सेवा के लिए समर्पित कर दिया. एक फौजी से जितना ही उसका परिवार मज़बूत
होता है और इस बात को मैं कुछ उदाहरणों के साथ समझाना चाहूंगा.
उड़ी
के आतंकी हमले में शहीद हुए गया के सुनील कुमार विद्यार्थी की शहादत की
ख़बर उनके घर पहुंच चुकी थी. चारों तरफ गम का सैलाब फैला था. किसी के आंसू
थम नहीं रहे थे. इसी बीच इस बहादुर पिता की तीन बेटियों ने भी बेहद बहादुरी
भरा कदम उठाया. शहीद की तीनों बेटियां आरती, अंशु और अंशिका इस गम के
माहौल में भी अपना एग्जाम देने पहुंची. यह देख स्कूल के सभी टीचर और
प्रिंसिपल हैरान थे. Source: Prabhat Khabar
पूरी दुनिया के लिए राजस्थान के निम्ब सिंह रावत एक फौजी
थे, जो उड़ी हमले में देश के लिए शहीद हो चुके हैं, लेकिन उस पांच साल के
बच्चे के लिए तो सिर्फ़ पापा थे. पांच साल के चंदन को सिर्फ इतना पता है कि
उसके पापा को मारने वाले आतंकवादी थे, जिनसे अब वह बदला लेना चाहता है.
जम्मू-कश्मीर के त्राल में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए
कर्नल एमएन राय को जब अंतिम विदाई दी जा रही थी, तब राय की पत्नी और बेटी
बिलख पड़ीं. यह करुण दृश्य देखकर हर किसी आंखें नम हो गईं. Source: HT
40 साल के शहीद बेटे को 80 साल की मां ने दिया कंधा, सबने किया हौसले को सलाम.
Source: Indian Army
अंतिम संस्कार के वक्त शर्मा के बेटे ढाई वर्षीय बेटे कन्नव और पांच साल की बेटी श्वेता ने भी सलामी दी थी.
Source: ANI
शहीद हनुमनथप्पा की पत्नी ने कहा, ‘बेटी को भी सेना में भेजूंगी.’
Source: Dainik Jagran
ये तो चंद शहीदों के उदाहरण थे, लेकिन एक बात तो तय है कि जवानों के
परिवार वाले फ़ौलाद का सीना लेकर पैदा होते हैं, जो अपने कलेजे के टुकड़े
को पूरे देश की हिफ़ाजत के लिए सौंप देता है. हां, ये बात अलग है कि हमारी
सरकार इन्हें हाशिये पर छोड़ देती है. आए दिन कुव्यवस्था के शिकार इन
परिवारों की ख़बरें पढ़ने और सुनने को मिलती हैं. इनके लिए कुछ भी न कर
पाने की, असहाय होने की पीड़ादायी छटपटाहट मुझे खा रही है, मैं परेशान हो
रहा हूं और हताश भी. किन्तु मेरा क्रोध भी कृत्रिम है.
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